झलक

15/10/2013 18:24

अब कोई खयाल भी आता नहीं खयालों में
जब से समाया है तेरा खयाल मेरे खयालों में
इक जूनून सा तारी है दिल के आलम पर
तेरी ही चाह अब रहती है हर सवालों में
जमीं से आसमां तक फैला है एहसास तेरा
झलक तेरी ही नजर आती है हर उजालों में
बंद आँखों में भी दिखती है सूरत तेरी
तेरी ही बंदगी है मेरे हर आमालों में
सुकून पाता है ‘क़मर’ बज्म में तेरी आकर
वरना खो गया होता गम के अंधियालों में।