चातक

15/10/2013 20:55

 

संध्या की पावन बेला में सब दुख रहा भुलाना

सभी दिशाओं में छाया खुशियों का ताना बाना

ऑंखों में सुंदर सपनों का इंद्रजाल है छाया

भाग्य जगे हैं जो अपने घर में आपको पाया

प्यास से व्याकुल चातक जैसे ताके नैन बिछाए

हम भी वैसे आकुल थे कब दर्शन आपके पाएं ?

हम तो खाली सीपी थे, आप स्वाति बनके आए

मन के कोने-कोने में मोती की निधि बरसाए।