मेरी कविताएं

कता

15/10/2013 21:50
सुकून खोजने न जाने किस किस दर पहुंचा। सुकून आया जब लौट कर के घर पहुंचा। दिल ही मरहम है दुखते दिल के जख्मों का इलाज की खातिर यूं ही शहर शहर पहंुचा।  

चातक

15/10/2013 20:55
  संध्या की पावन बेला में सब दुख रहा भुलाना सभी दिशाओं में छाया खुशियों का ताना बाना ऑंखों में सुंदर सपनों का इंद्रजाल है छाया भाग्य जगे हैं जो अपने घर में आपको पाया प्यास से व्याकुल चातक जैसे ताके नैन बिछाए हम भी वैसे आकुल थे कब दर्शन आपके पाएं ? हम तो खाली सीपी थे, आप स्वाति बनके आए मन के...

मेरा भारत है कितना महान!

15/10/2013 18:27
मेरा भारत है कितना महान!         प्रथम सभ्यता ज्ञाता है यह         जग का भाग्य विधाता है यह इसी भूमि ने दिया है सबको मानवता का वरदान। मेरा भारत है कितना महान! परोपकार को ध्येय विचारा इच्छाओं से कभी न हारा जनहित में इसने ही दिया है, निज...

झलक

15/10/2013 18:24
अब कोई खयाल भी आता नहीं खयालों में जब से समाया है तेरा खयाल मेरे खयालों में इक जूनून सा तारी है दिल के आलम पर तेरी ही चाह अब रहती है हर सवालों में जमीं से आसमां तक फैला है एहसास तेरा झलक तेरी ही नजर आती है हर उजालों में बंद आँखों में भी दिखती है सूरत तेरी तेरी ही बंदगी है मेरे हर आमालों में सुकून...

झंझावात

15/10/2013 18:19
  झंझावात कितना प्रबल है! दिशाएँ हो गईं निस्तब्ध, नभ हो गया निःशब्द, सरस मधुर पुरवाई अपना दिखा गई भुजबल है। झंझावात कितना प्रबल है! शाखें हैं टूटी-टूटी, सुमनों की किस्मत रूठी, टप-टप बूँदों ने बेध दिया हर पत्ती का अंतस्थल है! झंझावात कितना प्रबल है! पंछी तिनके अब जुटा रहे, चोटिल भावों को...
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